BJ ki Shayri

क्या कसूर…क्या कसूर…

ये बुलंदी किस काम की…
ये मैफ़िलें किस काम की….
जो ले जान इन वादियों की….
क्या कसूर….
क्या कसूर…
इन बेबस नदियों और सूखे झरनों का क्या कसूर…..
क्या कसूर….क्या कसूर………
ओ मतलबी इनसां…
तूने ये ज़ुल्म क्यूं किया…
रौंद के ज़मी को अपना अहम पूरा किया…..
तुने ये ज़ुल्म क्यूं किया…….


मौसम सब फीके हुए…
बदरंग भी दुनीया हुई…
ये सब तेरा ही कसूर…
ये सब तेरा ही कसूर….
अपनी फ़ला के लिए तू….
इस ज़मी को फ़ना ना कर….
फ़ना ना कर……..

क्या कसूर…क्या कसूर…
इन पेड़ों का क्या कसूर…
क्या कसूर …क्या कसूर…
इन फिज़ाओं का क्या कसूर…..
क्या कसूर….. क्या कसूर….
इन घटाओं का क्या कसूर…
क्या कसूर…क्या कसूर…..
अनीश मिर्ज़ा……

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